kash! ki mai tanha hi hota......

काश की मै तन्हा ही होता   


यूँ बिना परखे ऐसे तुमसे बेइंतहा इश्क़ नहीं करना चाहिए था हमें , हर दिन एक नयी उम्मीद के साथ जगता हूँ की आज तुम्हे ना याद करू, और रात को इस अफ़सोस के साथ नींद आती है की काश कभी तुमसे ना मिला होता। खैर गलतिया हर किसी से होता है मै खुदा तो नहीं जो  हर बार सही ही  होऊ , शायद अब तुम नहीं हो  पर तुम्हारा ख़ौफ़ या तुम्हारे इश्क़ का ख़ौफ़ आज भी हमे तन्हा रखा है , शायद इसे तालीम  कहते है जो तुमने , हमें इश्क़ की पनाह में दिया , तुम्हारा , मेरी जिंदगी में आना जायज़ था ,तुम्हारा मुझसे इश्क़ करना जायज़ था , तुम्हारा मुझे ख़्वाब दिखाना जायज़ था , तुम्हारी नजरो में तुम्हारा हर फ़ैसला जायज़ था बस  इंसान मै ग़लत पर तुम्हारा मुझे मेरे हालातों पे छोड़ जाना तुम्हारी नजरो में जायज था , मेरे लिए और मेरी नजरो में ये बस तुम्हारा फ़रेब था, इश्क़ हमारा था हक़ हम दोनों का था साथ फ़ैसले लेने का तुम्हारा कोई हक़ नहीं था इस तरह अपने फ़ैसले सुना एक रोज तनहा छोड़ चले जाने का। बेशक़ तुमसे बेइन्तहा इश्क़ करता हूँ और करूँगा पर तुम्हारी गुस्ताख़ी शायद ही कभी माफ़ कर सकूँ।अब तुम्हारी यादों के साथ प्यार या दुःख नहीं महसूस होता अब नफ़रत सी महसूस करता हूँ और शायद अब ये दिन महीने साल के साथ बढ़ता रहेगा ,अब तुम्हारा ज़िक्र मेरे मुहब्बत में नहीं शायद , मेरी  ग़लतियो में होने लगा है , तुम उम्र की पहली गलती ही रहोगी और मेरे कभी ख़त्म न होने वाले नफ़रत का हिस्सा। 

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