हिन्दी दिवस और हिन्दी के मौजूदा हालात


वैसे भी मेरी सुनता कौन है पर फिर से एक बार समाजिक मुद्दे पे | हमे पता है की लोग जितनी मेरी रचनाओ पे ध्यान देते है उनको उतने ही नफरत मेरे समाजिक मुद्दो से रहती है पर कोशिश यही रहता है की समाज के उन मुद्दो की तरफ ध्यानाकर्षित किया जाए जो उपेक्षित रहे है जैसे की हिन्दी भाषा या हिन्दी दिवस |
आज बेशक हम हिन्दी दिवस मना रहे है, जिसको राष्ट्रीय भाषा घोषित कराने के लिए बहुत सारे कवि और लेखक ने प्रयत्न किये पर वो कभी ना हो सका लेकिन हिन्दी दिवस मना खुद को तसल्ली देते है की हिन्दी हमारी भाषा है पर हिन्दी शब्द और उसके मौजूदा हालत सबको पता है, आज कल की पीढ़ी ही इससे जब मुंह मोड़ने लगी है तो अगली पीढ़ी को हम विरासत मे क्या देंगे ?
415 से भी ज्यादा भाषाओं वाले भारत देश को एक माला मे पिरो के जोडने का स्वप्न आज अधूरा है, और वजह सिर्फ हमारी नयी पिढ़ी है और उनकी अंग्रेजी भाषा अगर वास्तविकता देखी जाए तो इन सब नाकामयाबी के पीछे कही ना कही सरकार का भी उत्तरदायित्व रहा जो हिन्दी भाषा या इस विषय के प्रति उदासीन रहा है |
हमने अपनी परवरिश मे ही पश्चिमी सभ्यता को स्थान देना शुरू कर दिया है, बच्चो को अंग्रेजी मीडियम के स्कूलों मे 4 वर्ष की उम्र से प्रवेश करा दिया जा रहा है जब की 4 वर्ष के उम्र मे सही मायनों मे एक अच्छा शिक्षक उसकी माँ और पिता होते है जहा तक अभिभावक की बात करे तो बच्चो के अभिभावकों ने ही अंग्रेजी शिक्षा को इतना महत्वपूर्ण बना दिया है की अगली और पिछली पीढ़ी के बीच  दूरिया बढती जा रही है |
उदारहरण के रूप मे अगर देखे तो बच्चो के दादा, दादी को अंग्रेजी नही आती और बच्चो को हिन्दी की समझ नही अगर बच्चे कुछ अंग्रेजी मे बोले तो वो तो दादा, दादी को समझ नही आयेगा और दादा, दादी की बातें बच्चो के समझ नही एक पीढ़ी और तीसरी पीढ़ी के बीच इतना बडा अंतर शायद कही रिश्तो को अब हमसे दूर कर रहा है | 

इन सब के बीच अगर शिक्षा व्यवस्था को हम देखे तो ये वो कड़ी है जिसके जरिये हम हिन्दी भाषा को प्रोत्साहित किया जा सकता है, पर इन के उदासीनता कि वजह से आज हिन्दी अपना वजूद ढूंढ रही है, आज हर एक स्कूल और शिक्षण संस्थान के बैनरो पे ये नही दिखता की उनका विद्यालय हिन्दी माध्यम का है वरन ये जरूर दिखता है कि प्ले स्कूल अंग्रेजी मीडियम का है हिन्दी से अब इन्हे शर्मिंदा होना पड़ रहा है और अंग्रेजी सोच रखने वाले अभिभावको को भी |

वही अगर सरकार का रवैया देखे हिन्दी के प्रति तो वो भी बद से बदत्तर होती जा रही है देश की सबसे बडी परीक्षा सिविल सेवाओं मे भी हिन्दी अभ्यर्थी की संख्या दिन प्रतिदिन घटती जा रही है और सरकार अब भी मौन है अगर सच मे कहा जाए तो सिविल सेवाओ मे हिन्दी भाषा का घटता स्तर दो बातों को को सोचने पे मजबूर कर रहा है या तो हिन्दी को महत्व नही दिया जा रहा सिविल सेवाओ की परीक्षा मे या फिर शिक्षा स्तर ही खराब दोनो ही सूरतों मे सराकर की उदासीनता प्रदर्शित होती है |

हिन्दुस्तान, 1947 के आजादी के बाद हिन्दी भाषी क्षेत्र के रूप मे उदय हुआ जिसको आज तक एक राष्ट्र भाषा नहीं मिल सका 415 से भी क्षेत्रीय भाषाओ वाला देश भाषा के अस्तित्व पे बिखरा सा क्यो है ? देश की अशिक्षित जनता या तो क्षेत्रीय भाषा को समझती है या फिर टुटी फुटी हिन्दी जो आजकल अंग्रेजी ने हिन्दी को उन सब से दूर कर दिया है आखिर एक सवाल हमेशा से रहा है और रहेगा की  हिन्दी अपने ही देश मे उपेक्षित क्यो है ?
और सवाल समाज के उस हर एक तबके से जो आज हिन्दी दिवस मना रहा है अगर जिस दिन इस सवाल का जवाब हमें मिल गया उस दिन हिन्दी को अपनी जगह जरूर मिल जाएगा 

'सावन'

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