मैं, दिसंबर और ये साल : सावन

 और ये साल भी गुजरने को है, दिन गुजरे, महीने बीते फिर से आ गया दिसम्बर, ये वो महीना है जिसके गुजरते दिन के साथ ये साल भी गुजर जाता है। 

सच कहूं तो ये साल वाकई बुरा था, नए साल पे कुछ मांगू या ना मांगू पर ये साल दुबारा ना लौटे मेरी जिंदगी में ये एक बार जरूर प्रार्थना कर सकता हूँ, बाहर मौसम में जितना ठंड है यकीन करिए कलेजे ने उतनी ही धधकती आग है, पहले नए साल आने की खुशियां मनाते थे हम पर अब अकेले में बैठ के हिसाब करता हूँ, क्या खोया क्या पाया और जब से मैच्योरिटी आई है तब से हिसाब में सिर्फ घाटा ही हुआ है, मुनाफा तो दूर की चिड़िया है।

इस साल मुझे तजुर्बा मिला कि रिश्ते मतलब से बनते है, दकियानूसी समाज की नजरिए में मर्द पैसे के बिना कुछ भी नहीं और और पैसे ने सिखाया इस साल की तुम उसकी कदर नहीं करोगे तो फिर गली गली ठोकरें खाते फिरोंगे।

और सबसे बड़ी बात कि वफादारी बड़ी ही महंगी चीज है ये सबको नहीं मिलती और ना हर किसी से उम्मीद की जा सकती है 

खैर बंद कमरे में ठंडी हवा और मौसम के बीच धधकता हुआ कलेजा बहुत कुछ सोच रहा है लिखने को बहुत कुछ है 

इस दिसम्बर धीरे धीरे सब कह देंगे ताकि फिर कुछ ना रहे सीने में सुलगने को


सावन

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