जिंदगी का किस्सा : सावन

हर बार जब भी गुजरता हूँ मेगा मार्ट के सामने से देखता हूँ एक औरत को 35 से 38 साल की सांवली सी, कमजोर, खुद को वहां के ड्रेस कोड में एडजस्ट करते हुए पर्चियों का बंडल लिए मेगा मार्ट जाने वाले और वापस आने वाले ग्राहकों से रिक्वेस्ट करते हुए की कोई एक पर्ची उनकी ले ले, सच कहूं तो मैं दिन के किसी भी वक्त पे आता उनको देखता खड़े खड़े ग्राहकों को अपनी बात समझाने की असफल प्रयास करते हुए चाहे वो मार्ट खुलने का वक्त हो या इस ठंडी के शाम 6 हर वक्त वो वही मिलती है।
शायद ही कोई ग्राहक होगा जिसको वो आग्रहपूर्वक उस पर्ची को लेने के लिए ना बोले पर बहुत कम लोग उनकी बातों पे ध्यान देते है मै भी उन्हीं में से हूँ जो उन पे ध्यान नहीं देता था उनकी बातों को अनसुना कर देता था, पर जब आज शाम मार्ट के बाहर कॉफी का ऑर्डर कर रहा था तो, जिन को मैं रोज़ इग्नोर करता था आज उन्हें देखा ध्यान से और दिखा उनकी बेबसी शायद कोई सुन ले इस उम्मीद में लोगो के पीछे पीछे तक जाना, लोगो के अनसुना कर दिया जाने के बाद का तकलीफ़ शायद दिन भर खड़े रहने के बाद का थकान, बातों बातों में कॉफी देने वाले बच्चे ने बताया कि वो रोज़ के दिहाड़ी पे रखी गई है और उनके 2 बच्चे है और बड़ी मेहनती है, जो कि मै देख था। अचानक कॉफी वाले बच्चे ने कॉफी पाउडर कॉफी में डाला और मेरा ध्यान उसकी बातों से हटकर उसपे चला गया क्योंकि मैने मना किया था वो पाउडर ना डाले। 
फ़िर बातों का सिलसिला वहीं से बदल गया पर ध्यान अब भी उनपे ही था कि ज़िंदगी आसान नहीं है उनके लिए जिनको सुबह उठकर खाने का इंतज़ाम करना होता है, जिनके ऊपर है जिम्मेदारियों का बोझ 

ये उस हर इंसान का दर्द है जो बस इस समाज के सबसे निचले हिस्से में आता है और जीने की कोशिश कर रहा है तालमेल बिठा रहा है समाज के बड़े वर्ग के साथ उम्मीद से दिन शुरू होता है और सन्नाटे और ग़म में रात।

आज की कॉफी सच में कड़क थी 🙏🏻

सावन

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