पतंग ; आज़ादी के मायने और उसकी बंदिशें
ज़िंदगी पतंग की भाँति थी।
और मैं नासमझ आसमान की उस पतंग सी। जो उस ड़ोर से छूटना चाहती थी। मुझे वो डोर बेड़ियों से भी ज्यादा चुभने लगी थी। हर पल लगता था कि यही मेरी आज़ादी की सबसे बड़ी बाधा है, और मैं हरपल उस डोर से भागती थी।
एक समय वो डोर टूट भी गई.... डोर टूटते ही मैं आसमान से नीचे गिरने लगी। लोग मुझे पाने के लिए दौड़ पड़े।
मैं जब आसमान से जमीन पे पहुँची तब तलक मुझे पाने की चाहत में लोग मुझे बेआबरू कर चुके थे।
बस उस वक्त एहसास हुआ कि मेरी डोर ही मेरी मजबूती थी। मैं उसके हाथों में महफूज थी।
पर मैं जबतक यह समझ पाती बहुत देर हो चुकी थी।
“पिता और परिवार के साये से बाहर की ये जिंदगी उतनी आसान नही है जितना हम टेलीविजन, सिनेमा में देखते हैं। अपने सपनों से बाहर आकर एक बार बाहरी दुनिया को आभास कीजिये। पिता-परिवार को गलत सिद्ध करने व आधुनिकता की होड़ में आगे निकलने का एक सीमित क्षेत्र है।”
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Pic's Credit : @kitesindia (insta)
“धूमिल”
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