ग़ज़ल - Ghazal

ग़ज़ल -

यू जो विराने दिल मे इश्कबाज़ी की आग लगा रहे हो, 

कर रहे हो भुल तुम, वीरानी इमारत को सजा रहे हो, 


देखे कई, हमने बसंत मुहब्बत के, अपनी जिंदगानी मे,

ये लगते बेहद हसीन उस बंद किताब के ख़्वाब सी कहानी मे, 


नई सोहबत इश्कबाज़ी की, वक्त के साथ तुम भी सीख जाओगे, 

ठहरों वक्त क्या हुआ तुम्हारा आये इस मजलिस मे, सब्र करो तुम भी दर्द मे जीना सिख जाओंगे


'सावन'

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