गुमनामी मे लिखता हूँ खामोशी अपनी...... 'सावन'
तुम समझ रहे हो जैसा मुझको
वैसे मेरे अब हालात नहीं है
एक बंद कमरे मे सिमट गया हूँ
मुझमे कोई अब जज़्बात नहीं है
मुझे है सुकून देने लगी है खामोशीं
अब शोरों मे मेरी कोई आवाज नहीं है
गुमनामी मे लिखता हूँ खामोशी अपनी
इस दुनिया मे मेरी कोई पहचान नहीं है
अपनों ने भी हमे छला इस कदर
की अब मेरा कोई हमराज नहीं है . ..
©सावन
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