मै और ये दिसम्बर
आसान है क्या दिसम्बर होना…?
अपने हिस्से का इंतज़ार करना,
धीरे-धीरे सबको गुजरते देखना,
और फिर अपने समय का शुरू होना।
नए साल के दहलीज पे खड़ा हो के
पिछले महीनों की यादों से रूबरू होना
जैसे ही महीना गुजरे—साल का भी बदल जाना।
सच कहूँ तो… आसान है क्या दिसम्बर होना?
कभी-कभी सोचता हूँ—दिसम्बर इतना सख़्त क्यों होता है?
शायद इसलिए कि इसका वजूद ही
नए साल की उम्मीदों से शुरू होता है।
लोग दिसम्बर को जीने से ज्यादा
नए साल के आने का इंतज़ार करते हैं…
यही वजह है कि दिसम्बर कुछ भारी लगता है।
जाता हुआ दिसम्बर याद दिला रहा है,
ये साल कितना बुरा था एहसास करा रहा है।
उम्मीद है नया साल कुछ ख़ास होगा हमारे लिए।
जो गया… उसे जाने देना ही बेहतर था मेरे लिए।
अब तो किस्मत पर भी भरोसा होने लगा है।
कभी-कभी खुदगर्ज भी हो जाता हूँ मैं अपने लिए—
पर धीरे-धीरे, सही… ये वहम भी टूटता जा रहा है।
— 'सावन'
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