दिसंबर की दस्तक


कुछ रोज़ बाद बीत जाएगा दिसंबर,  
फिर इसका कोई नामो-निशान नहीं होगा।  
अगले साल के आने की खुशियाँ यूँ छा जाएँगी,  
कि गुजरते वर्ष को पूछने वाला कोई इंसान नहीं होगा।

भूल जाते हैं लोग हर दर्द, हर किस्सा,  
बस भुलाने वाले हालात होने चाहिए।  
ठंडी हवा में लिपटा ये आख़िरी महीना सिखा जाता है,  
कि दर्द वाली यादें चाहे कितनी क़वी हों—  
समय के साथ सब धुंधलाना चाहिए।

'सावन'

टिप्पणियाँ

Advertisement

Contact Us

भेजें