कभी-कभी मुझे लगता है मैं तो यूं ही हूं बस यूं ही...विकास कुमार चौबे
कभी-कभी मुझे लगता है मैं तो यूं ही हूं बस यूं ही।
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अब जब दिल में मेरे, तेरी धड़क नहीं।
तुझे पाने की भी अब, कोई तड़प नहीं।।
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मेरी आंखों में सपना, अब तेरा नहीं।
तेरी बातों में जिक्र, भी अब मेरा नहीं।।
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अब मेरी आंखों में जब, सिर्फ और सिर्फ पानी है।
दे कोई भी सदा, सुनाई देती बस तेरी कहानी है।।
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अब तन्हाइयों में भी जब, तेरा साथ नहीं मिलता।
लिखना तो चाहता हूं पर, जज्बात नहीं मिलता।।
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जब भी कभी खुद को मै, तेरे किस्से सुनाता हूं।
तू पास नही है अब, दिल को यही समझाता हूं।।
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वहां ऊपर से चांद भी, मुझ पर हंसता है।।
फिर मौसम भी जैसे मेरे, साथ बरसता है।।
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तेरे अधूरे वादों को जब, एक साथ सजाता हूं।
हो जाता हूं शिथिल सा, और खुद को पता हूं।।
-की मै बस यूं ही हूं, बस यूं ही ।।
✒ विकास कुमार चौबे
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