तमाम वादों की बुनियाद पर रिश्ता बनाकर, मैंनें लोगों को अक्सर मुकरते देखा है..... शम्भवी शिव

तमाम वादों की बुनियाद पर रिश्ता बनाकर,
मैंनें लोगों को अक्सर मुकरते देखा है।

अच्छे वक्त में मुँह दिखाकर बुरे वक्त में नज़रें घुमा ली,
मैंनें रिश्तों को इस कदर बदलते देखा है।

दोस्त कहकर दुश्मनों से बदतर सलूक कर दिया,
मैंनें अहबाबों की नीयत को भी फिसलते देखा है।

देते हैं आशीर्वाद बच्चों को बड़ा होने का,
मैंनें उन बड़ों को बचपन के लिए तरसते देखा है।

वो जो समेटकर चलते हैं एक डोर में सबको,
मैंनें उन फ़रिश्तों को टूटकर बिखरते देखा है।

पेश आते हैं सख़्ती से जो सबके सामने,
मैंनें महबूब की याद में उन्हें मचलते देखा।

जिसे शौक नहीं था कभी साज-श्रृंगार का,
मैंने उस लड़की को इश्क़ में संवरते देखा है।

मूँदकर आँख जिसने प्रेम को पूजा था कभी,
मैंने उसके दिल में नफरत की आग को जलते देखा है।

✒ शम्भवी शिव

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