दिल में जो भावों से भरा समंदर है, क्या ये कौतुहल सिर्फ़ मेरे ही अन्दर है? - विनीत

दिल में जो भावों से भरा समंदर है,
क्या ये कौतुहल सिर्फ़ मेरे ही अन्दर है?

क्या शब्दों को यूं जोड़ना नाकाफी सा है?
ख़यालों की सुनामी को
मन में दबा के रखना भी तो नाइंसाफी सा है,

मैं यूं तो कोई 'गुलज़ार-दिनकर-मीर' नहीं हूँ,
तबीयत भर के देख जाओ तुम,
ऐसी कोई तस्वीर नहीं हूँ,

लिखना रिवाज़ तो नहीं था मेरा,
बस नासूरों का खून बहाना था,
हम तो सब कुछ हार गये,
बस तुम्हें इश्क़ के परिणाम से रुबरु कराना था ||

~विनीत

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